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August 2, 2021
राजनीति विचार

रंजन गोगोई लेंगे राज्यसभा की शपथ: क्या न्यायपालिका की विश्वसनीयता कमजोर हो रही है?

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, रंजन गोगोई को 16 मार्च को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए जाने के तीन दिन बाद, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के आज गुरुवार को संसद सदस्य (सांसद) के रूप में शपथ लेंगे। गोगोई के नामांकन की घोषणा गृह मंत्रालय ने सोमवार रात जारी एक अधिसूचना में किया था। गोगोई को राज्यसभा में मनोनीत करना कई सवालों को उत्पन्न करता है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने उच्चतम न्यायालय की पीठ का नेतृत्व किया जिसने राफेल सौदे और अयोध्या शीर्षक विवाद जैसे राजनीतिक रूप से अस्थिर मामलों का फैसला किया।

राफेल सौदे के मामले में, कांग्रेस के तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत रूप से शामिल होने का आरोप लगाया था। मामला 2019 के लोकसभा चुनाव तक चलने के दौरान सुलझा लिया गया। अयोध्या शीर्षक विवाद मामले में, भाजपा ने उस स्थान पर राम मंदिर के निर्माण का समर्थन किया, जहां मुगल युग बाबरी मस्जिद 1992 तक थी। नवंबर 2019 में न्यायमूर्ति गोगोई के सेवानिवृत्त होने से कुछ दिन पहले यह मामला तय किया गया था। दोनों मामले उन निर्णयों पर समाप्त हुए जो भाजपा, केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के अनुकूल थे।

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ऐसे और भी कई मामले उदहारण स्वरूप मौजूद है, जैसे कि पूर्व न्यायमूर्ति पी सतशिवम सुप्रीम कोर्ट से अपनी सेवानिवृत्ति के चार महीने के भीतर 2014 में केरल के राज्यपाल बने।संयोग से, वह उस बेंच पर थे जिसने एक फर्जी मुठभेड़ का मामला तय किया था जिसमें अमित शाह, जो अब केंद्रीय गृह मंत्री हैं, का नाम लिया गया था और अमित शाह को उस मामले में क्लीन चिट मिल गई थी।

रंजन गोगोई को नामित किए जाने के बाद कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला, कपिल सिब्बल और एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल खड़े किए हैं,  कपिल सिब्बल ने ट्विटर पर कहा कि न्यायमूर्ति गोगोई राज्यसभा जाने की खातिर सरकार के साथ खड़े होने और सरकार एवं खुद की ईमानदारी के साथ समझौता करने के लिए याद किए जाएंगे। इस कदम की आलोचना करने वाले विपक्षी दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं की पृष्ठभूमि में, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने नरेंद्र मोदी सरकार के भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी सेवानिवृत्ति के चार महीने बाद ही उन्हें राज्यसभा में नामित करने के कदम का बचाव किया, और नामांकन को राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ा।

अब सवाल यह है कि, क्या यह सही है कि सभी सवालों का जवाब राष्ट्रवाद के अलावा कुछ नहीं हो सकता? क्या राष्ट्रवाद शब्द का इस्तेमाल करके खुद का बचाव करना सही है? ऐसे मे यह एक स्पष्ट संदेश है कि अगर आप ऐसे फैसले देंगें जो कार्यपालिका को पसंद होंगे तो आपको पुरस्कृत किया जायेगा। और सबसे चिंताजनक बात यह है कि सर्वाच्च न्यायालय का नेतृत्व इस दिशा का अनुसरण कर रहा है जो एक लोकतांत्रिक देश के लिए सही नहीं है।

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