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बिहार क्रिकेट का ‘ब्लैकआउट’: प्रतिभा हारी, भ्रष्टाचार और परिवारवाद जीता

बिहार क्रिकेट का 'ब्लैकआउट': प्रतिभा हारी, भ्रष्टाचार और परिवारवाद जीता
बिहार क्रिकेट का 'ब्लैकआउट': प्रतिभा हारी, भ्रष्टाचार और परिवारवाद जीता

जब बल्ला राजनीति की पिच पर चलने लगे, तो खेल का मैदान अखाड़ा बन जाता है। बिहार क्रिकेट एसोसिएशन (BCA) की आज यही कहानी है।


बिहार में क्रिकेट कभी उन हज़ारों युवाओं का सपना हुआ करता था, जो गलियों से निकलकर टीम इंडिया तक पहुंचने का दम रखते थे। लेकिन आज यह सपना भ्रष्टाचार, गुटबाजी और सत्ता के लालच की भेंट चढ़ चुका है। बिहार क्रिकेट के इस पतन के केंद्र में एक नाम प्रमुखता से आता है—राकेश कुमार तिवारी। पूर्व अध्यक्ष और बिहार भाजपा के कोषाध्यक्ष राकेश तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने खेल की संस्था को अपनी निजी जागीर और राजनीति का अड्डा बना दिया।

राजनीति की पिच पर क्रिकेट का कब्ज़ा

राकेश तिवारी का 2019 में बीसीए अध्यक्ष बनना खेल से ज्यादा राजनीतिक रसूख का नतीजा था। जब वे आए, तो लगा कि शायद सालों से चल रही कानूनी लड़ाइयां खत्म होंगी, लेकिन हुआ इसके उलट। आरोप है कि उन्होंने बीसीसीआई में अपनी पैठ का इस्तेमाल कर बीसीए पर अपना एकछत्र राज स्थापित किया। विरोधियों का कहना है कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एसोसिएशन को चलाया, जहाँ असहमति की कोई जगह नहीं थी।

भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप: जब खेल बिका करोड़ों में

राकेश तिवारी के कार्यकाल के दौरान जो खुलासे हुए, वे किसी भी खेल प्रेमी का दिल तोड़ने के लिए काफी हैं:

  • रणजी टीम में ‘पैसे देकर एंट्री’: जेडीयू विधायक संजीव कुमार ने 2023 में संगीन आरोप लगाया कि रणजी टीम में जगह बनाने के लिए 40-50 लाख रुपये वसूले जाते हैं। बाहर के राज्यों के खिलाड़ियों को फर्जी कागजात बनवाकर टीम में डाला गया, जिससे बिहार के असली हुनरमंद खिलाड़ी घर बैठने को मजबूर हो गए।
  • आर्थिक धोखाधड़ी: 2025 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने एक मृत कोषाध्यक्ष के फर्जी हस्ताक्षर कर बैंक से 30 लाख रुपये निकाले। यह मामला कोर्ट और पुलिस तक पहुँचा, जिसने बीसीए की साख मिट्टी में मिला दी।
  • महिला उत्पीड़न का विवाद: 2022 में दिल्ली के एक होटल में एक महिला ने उन पर गंभीर आरोप लगाए। हालांकि बाद में यह केस कानूनी पचड़ों में उलझकर रह गया, लेकिन इससे एसोसिएशन की छवि पर जो दाग लगा, वह आज भी कायम है।

परिवारवाद की हद: बेटे को सौंप दी ‘विरासत’

क्रिकेट के प्रति संवेदनहीनता तब चरम पर दिखी, जब 2025 के बीसीए चुनावों में राकेश तिवारी के 24 वर्षीय बेटे हर्षवर्धन तिवारी को निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिया गया। हर्षवर्धन का क्रिकेट के मैदान से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा है, लेकिन सत्ता के रसूख ने उन्हें बिहार क्रिकेट का सर्वेसर्वा बना दिया। इसे बिहार के युवा खिलाड़ियों के भविष्य पर अंतिम प्रहार माना जा रहा है।

क्या होगा बिहार क्रिकेट का भविष्य?

आज हालत यह है कि बिहार की टीमें रणजी ट्रॉफी में सबसे निचले पायदान पर हैं। अच्छे खिलाड़ी दूसरे राज्यों से खेलने को मजबूर हैं। 2024-25 में तो स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि कोर्ट को दखल देकर टीम चुननी पड़ी।

अगर बीसीसीआई और राज्य सरकार ने जल्द ही इस गंदगी को साफ नहीं किया, तो बिहार क्रिकेट का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय हो जाएगा। खेल को राजनीति से आजाद करना अब एक जरूरत नहीं, बल्कि बिहार के युवाओं के लिए एक अनिवार्य लड़ाई बन गई है।