राज्य विवाद

झारखंड सरकार ने पेसा के नाम पर आदिवासियों को दिया धोखा: चंपाई सोरेन

झारखंड सरकार ने पेसा के नाम पर आदिवासियों को दिया धोखा: चंपाई सोरेन
झारखंड सरकार ने पेसा के नाम पर आदिवासियों को दिया धोखा: चंपाई सोरेन

रांची: पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने झारखंड सरकार पर बड़ा आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पेसा नियमावली के जरिए सरकार ने आदिवासी समाज के साथ धोखा किया है।

उन्होंने बताया कि पिछले महीने सरकार ने पेसा कानून लागू किया, लेकिन नियमावली को छिपाकर रखा। अब जब नियमावली सामने आई तो साफ हो गया कि इसे क्यों छिपाया जा रहा था।

हाई कोर्ट के दबाव और विपक्ष के आंदोलन के बावजूद जो नियमावली आई है, वह पूरी तरह आदिवासी विरोधी है। पुरानी नियमावली से तुलना करें तो सरकार ने पेसा के असली रूप को ही बदल दिया है।

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ग्राम सभा के गठन में रूढ़िगत कानून और धार्मिक प्रथाओं जैसे शब्द गायब कर दिए गए हैं। संविधान में भी इन परंपराओं को मान्यता दी गई है, फिर सरकार इन्हें हटाकर किसे फायदा पहुंचाना चाहती है? अगर ग्राम सभा में पारंपरिक व्यवस्था को नजरअंदाज करेंगे तो पेसा का मतलब क्या रह जाएगा? यह पेसा की मूल भावना का सीधा उल्लंघन है।

पेसा कानून का मुख्य उद्देश्य ही आदिवासी समाज की पुरानी परंपराओं, सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों को बचाना है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि पेसा आदिवासी स्वशासन और सांस्कृतिक संरक्षण का संवैधानिक हिस्सा है।

लेकिन यह सरकार उन लोगों को अधिकार देना चाहती है जिन्होंने आदिवासी धर्म और जीवनशैली को बहुत पहले छोड़ दिया है। जो अपना अलग धर्म मानते हैं और अल्पसंख्यक लाभ लेते हैं, वे अब आदिवासियों के हक भी छीन लेंगे।

चंपाई ने ओडिशा के नियमगिरि मामले का उदाहरण दिया। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों की धार्मिक मान्यता को मानकर वेदांता की खदान रद्द कर दी। आदिवासियों ने कहा कि वहां उनके देवता रहते हैं, कोर्ट ने इसे स्वीकार किया।

जब कोर्ट हमारी मान्यताओं को मानती है तो राज्य सरकार को क्या परेशानी है? ऐसा पेसा किस काम का?

नई नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकार बहुत कम कर दिए गए हैं। सामुदायिक संसाधनों की परिभाषा पहले जल, जंगल, जमीन और लघु खनिजों तक थी, अब सिर्फ सरना, जाहेर और सांस्कृतिक जगहों तक सीमित है। अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से कैसे दूर रख सकते हैं?

ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन की आजादी थी, लेकिन अब अधिकार सीमित हैं। पहले राज्य योजनाओं और फंड को मंजूरी दे सकती थी, अब सिर्फ सहमति ली जाएगी – 30 दिन में नहीं दी तो मान लिया जाएगा।

गठन से विवाद तक सब अधिकार उपायुक्त को दे दिए गए हैं। ग्राम सभा की भूमिका क्या बचेगी?

बालू, मिट्टी, पत्थर जैसे लघु खनिजों पर पहले पूरा अधिकार था, अब सरकार के निर्देश मानने होंगे। स्थानीय इस्तेमाल के लिए खनन की अनुमति अब नहीं दे सकती।

CNT/SPT कानून तोड़ने पर जमीन वापसी का अधिकार हटा दिया गया। सत्ता में बैठे लोग खुद इन कानूनों को तोड़ते हैं, तो ऐसा होना ही था।

अनुसूचित क्षेत्रों में उद्योगों के लिए कोई दिशा-निर्देश नहीं। उद्योग, डैम या विकास के नाम पर विस्थापन की कीमत हम आदिवासी क्यों चुकाएं?

चांडिल डैम से 116 गांव डूबे, लेकिन विस्थापितों को क्या मिला? जमशेदपुर आदिवासियों की जमीन पर बना, वे मूल लोग अब कहां हैं?

टाटा की लीज नवीनीकरण तुरंत रोका जाए।

नियमावली में शराब दुकानों का तो ध्यान रखा, लेकिन विस्थापितों के हक भूल गए। यही सरकार की असली प्राथमिकता है।

आदिवासी अधिकार छीनने की इस कोशिश का हर स्तर पर जोरदार विरोध होगा।