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क्षेत्रीय न्यूज़ संस्कृति

रहने को घर नहीं सोने को बिस्तर नहीं अपना तो खुदा है रखवाला,अब तक इसी ने है पाला!

एक ऐसा परिवार जो बेघर है…

जिसे गाँव वालों के सहयोग से बनाकर दी गई झोपड़ी…

शौचालय में रखते हैं सामान….

 

मझगाँव: रहने को घर नहीं सोने को बिस्तर नहीं अपना तो खुदा है रखवाला,अब तक इसी ने है पाला…। इस गाने का चरितार्थ बना है बलियापोसी पँचायत के गढ़केशना का पीड़ित पर फिट बैठता है । जी हाँ गढ़केशना के सुदर्शन पान का जिसको रहने के लिए घर नहीं है । सुदर्शन पान अपनी पत्नी कमला पान चार बेटा व एक बेटी के साथ गाँव वालों के सहयोग से प्लास्टिक घेरकर व पुआल का झोपड़ी टाँगकर मानों खुली आसमां के सीधे अपना जीवन बसर कर रहा है । कमला पान ने भाष्कर को बताया कि पति ओड़िशा के डुबरी में क्रेशर में मजदूरी का काम करता था । लॉक डाउन में काम छुटा तो गाँव आ गया और पचास- सौ रुपये का दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रहा है । गाँव में घर नहीं होने के कारण गाँव वालों के घरों के बरामदे में दिन गुजार रहा था । गाँव वालों के सहयोग से प्लास्टिक घेरकर और पुआल का झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं और सरकारी सुविधा के नाम पर शौचालय में खाने का बर्तन रख बाहर खुले में भोजन बनाकर खाने को मजबुर हैं । ऐसे में कंबल व रजाई तो उन्हें सपना लग रहा है । बीपीएल में नाम है या नहीं उन्हें पता नहीं । अगर नाम है भी तो उसे प्रधानमंत्री आवास का लाभ नहीं मिल सकता क्योंकि उनका परिवार के किसी भी सदस्य के नाम पर राशन कार्ड, आधार कार्ड और बैक में खाता नहीं खुला है । उसके झोपड़ी में दो साड़ी ,सोने के लिए बिछा हुआ पुआल व खाने के लिए एक किलो चावल बस । ठंड के छोटे मासुम फरिश्ते खुला बदन देखे गये । जो कि चिंता का विषय बना हुआ है।

इस संदर्भ में मुखिया ऐवलिन पिगुँवा से जानकारी लिया गया तो उन्होंने जानकारी दिया कि इनके परिवार के लोग लॉक डाउन के बाद गाँव पहूँचा । लेकिन स्वंय मिलकर आवास प्लस में नाम जोड़ने के लिए आधार नम्बर व खाता संख्या माँगा गया । लेकिन इन लोंगो ने किसी प्रकार का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवाया । आधार और बैंक में खाता खोलवाने के लिए प्रक्रिया शुरु कर दी गई है जल्द ही इन्हें सरकार के द्वारा दी जा रही लाभ दिलवाने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है ।