स्वाद वही, उम्र लंबी: वैज्ञानिकों की मदद से अब देश-विदेश के बाज़ारों तक पहुँचेगी डोगरा संस्कृति की पहचान
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने हाल ही में खाद्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर उधमपुर की प्रसिद्ध ‘कलादी’ को एक नई पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। उधमपुर और आसपास के इलाकों में पारंपरिक रूप से बनाई जाने वाली यह ‘चीज’ (Cheese) अपने लाजवाब स्वाद के लिए जानी जाती है, लेकिन अब इसे आधुनिक तकनीक के जरिए लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तैयारी की जा रही है।
क्या है कलादी और क्यों है यह खास? कलादी कोई साधारण दूध उत्पाद नहीं है। इसे शुद्ध और मलाईदार दूध से पुराने पारंपरिक तरीकों से तैयार किया जाता है। इसकी बनावट थोड़ी खिंचाव वाली और स्वाद गहरा दूधिया होता है। डोगरा खानपान का यह अहम हिस्सा स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। कुछ साल पहले इसे जीआई (GI) टैग भी मिला, जिससे स्थानीय परिवारों के लिए कमाई के नए रास्ते खुले हैं।
दिक्कत कहाँ आ रही है? कलादी की सबसे बड़ी समस्या इसकी ‘शेल्फ लाइफ’ यानी इसका जल्दी खराब होना है। बिना फ्रिज के यह कुछ ही दिनों में खराब हो जाती है, जिस कारण इसे उधमपुर से दूर के शहरों या विदेशों में भेजना मुश्किल होता है।
वैज्ञानिकों के साथ नई रणनीति इस चुनौती को दूर करने के लिए डॉ. जितेंद्र सिंह ने मैसूर (CSIR-CFTRI) और जम्मू के बड़े संस्थानों के वैज्ञानिकों से चर्चा की है। योजना यह है कि:
- पैकिंग और प्रोसेसिंग: इसे वैज्ञानिक तरीके से पैक किया जाए ताकि यह महीनों तक खराब न हो।
- शुद्धता बरकरार: सबसे बड़ी शर्त यह है कि तकनीक के चक्कर में कलादी का असली स्वाद, उसकी बनावट और पौष्टिकता में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आना चाहिए।
- 6 महीने का टारगेट: अगले छह महीनों के भीतर इसकी पूरी कार्ययोजना तैयार कर ली जाएगी।
गांवों में बढ़ेगी समृद्धि मंत्रीजी का उद्देश्य कलादी को ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) योजना के तहत बड़े स्तर पर प्रमोट करना है। इससे न केवल डोगरा खानपान की चमक दुनिया भर में बढ़ेगी, बल्कि उधमपुर के किसानों और युवाओं को स्वरोजगार के बेहतरीन मौके मिलेंगे। जब कलादी का निर्यात शुरू होगा, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नई मजबूती मिलेगी।











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