Warning: Trying to access array offset on value of type bool in /home/thetehel/public_html/azadkhabar.com/wp-content/plugins/wp-postviews/wp-postviews.php on line 65
अभी-अभी देश

कश्मीर के किसानों को मिली ‘मीठी’ सौगात: अब सर्दियों में भी यहीं बनेगा शहद

इसे 'माइग्रेशन' कहते हैं। इसमें खर्चा भी होता था, भागदौड़ भी और छत्तों के नुकसान का डर भी बना रहता था। लेकिन वैज्ञानिकों की इस नई तकनीक ने मानो किसानों की एक बड़ी चिंता दूर कर दी है।
इसे 'माइग्रेशन' कहते हैं। इसमें खर्चा भी होता था, भागदौड़ भी और छत्तों के नुकसान का डर भी बना रहता था। लेकिन वैज्ञानिकों की इस नई तकनीक ने मानो किसानों की एक बड़ी चिंता दूर कर दी है।

विज्ञान का चमत्कार: न माइग्रेशन का खर्चा, न ठंड का डर—पुलवामा में मधुमक्खी पालन की नई शुरुआत


कश्मीर की हाड़ कंपा देने वाली ठंड और मधुमक्खी पालन—ये दो बातें अब तक एक साथ मुमकिन नहीं लगती थीं। लेकिन पुलवामा की वादियों में कुछ ऐसा हुआ है जिसने इस सोच को बदल दिया है। यहाँ के किसानों और शहद प्रेमियों के लिए एक बहुत ही अच्छी खबर आई है। सीएसआईआर-आईआईआईएम (CSIR-IIIM) के वैज्ञानिकों ने अपनी मेहनत से वह कर दिखाया है, जो अब तक किसी चुनौती से कम नहीं था। उन्होंने पुलवामा की कड़ाके की सर्दी में भी मधुमक्खियों को न सिर्फ जिंदा रखने में, बल्कि उन्हें चुस्त-दुरुस्त रखने में कामयाबी हासिल की है।

अक्सर सर्दियों में हमारे किसान भाइयों को अपनी मधुमक्खियों को बचाने के लिए उन्हें गर्म इलाकों (जैसे राजस्थान या जम्मू के मैदानी हिस्सों) में ले जाना पड़ता था।

इस नई सफलता का मतलब यह है कि अब मधुमक्खी पालकों को अपने बक्से लेकर हज़ारों किलोमीटर दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मधुमक्खियां यहीं अपने घर में, यानी कश्मीर में ही सुरक्षित रहेंगी।

CSIR-IIIM की टीम ने इस पर लंबा शोध किया और ऐसे तरीके ढूंढे जिससे मधुमक्खियों को ठंड से बचाया जा सके। यह सफलता सिर्फ पुलवामा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जम्मू-कश्मीर और भारत के अन्य ठंडे पहाड़ी इलाकों के किसानों के लिए भी वरदान साबित होगी।

स्थानीय किसान इस बदलाव से बेहद खुश हैं। एक मधुमक्खी पालक ने बताया कि अब वे माइग्रेशन की टेंशन छोड़कर अपने शहद की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दे पाएंगे। यह एक छोटी सी वैज्ञानिक जीत है, लेकिन इसने घाटी के किसानों के लिए भविष्य में ‘मीठे’ दिनों की उम्मीद जगा दी है।