व्यापार और सुरक्षा से परे, योग कैसे घोल रहा है दोनों देशों के रिश्तों में मिठास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही मलेशिया के दौरे पर जाने वाले हैं। वैसे तो इस यात्रा के दौरान बड़े-बड़े समझौतों और कूटनीतिक चर्चाओं पर दुनिया की नजर रहेगी, लेकिन शोर-शराबे से दूर, एक ‘खामोश राजदूत’ है जो दोनों देशों के दिलों को जोड़ रहा है—और वह है भारत का प्राचीन उपहार ‘योग’।
भारत और मलेशिया के बीच रिश्तो में हमेशा से गरमाहट रही है, लेकिन हाल के दिनों में योग ने इसे एक नया आयाम दिया है। यह सिर्फ़ एक कसरत नहीं रह गया है, बल्कि दोनों देशों की संस्कृति के मिलन का जरिया बन गया है। मलेशिया के पार्कों और कम्युनिटी सेंटर्स में सुबह-सुबह लोगों का योग करना अब एक आम नज़ारा है।
मजे की बात यह है कि यह जुड़ाव सिर्फ़ जनता तक सीमित नहीं है। दोनों देशों की सरकारें भी मानती हैं कि ‘रणनीतिक साझेदारी’ सिर्फ़ कागज़ों पर नहीं, बल्कि लोगों के बीच समझदारी से मजबूत होती है। जगह-जगह हो रहे योग शिविर और वर्कशॉप इसका सबूत हैं। इन कार्यक्रमों में न तो कोई भाषा की दीवार होती है और न ही धर्म की; बस स्वास्थ्य और शांति का एक साझा लक्ष्य होता है।
पीएम मोदी की आने वाली यात्रा में निश्चित तौर पर व्यापार, सुरक्षा और भविष्य की योजनाओं पर बात होगी। लेकिन, योग ने पहले ही एक सकारात्मक माहौल तैयार कर दिया है। इसे ‘सॉफ्ट पावर’ कहें या दिलों का जुड़ना, सच तो यह है कि योग जैसी सरल चीज़ ने कूटनीति को भी आसान बना दिया है।
यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान हमें याद दिलाता है कि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, शांति और अच्छी सेहत की तलाश हम सबको एक ही धागे में पिरोती है। मलेशिया में योग की बढ़ती लोकप्रियता इसी बात की गवाह है।











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